राव तुलाराम का इतिहास ओर जीवनी | Rao Tularam

राव तुलाराम का इतिहास Rao Tula Ram History in Hindi


Rao Tularam ने भारत देश को आजाद कराने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। अपनी एक विशाल सेना खड़ी की ओर उस भारतीय सेना को मजबूत बनाने के लिये बाहरी देशो से भी मदद लाने में कोई कसर नही छोड़ी थी। आज इस पोस्ट में अहीरवाल के गढ़ में पैदा हुये रणबाँकुरे Rao Tularam के इतिहास को जानेंगे।

राव तुलाराम का जन्म 9 दिसंबर 1925 को रेवाड़ी के रामपुरा में हुआ था। उस समय रेवाड़ी रियासत पर उनके पिता राव पूर्ण सिंह का राज था। रियासत में उस समय करीब 87 गांव शामिल थे जो आज के दक्षिणी हरियाणा में फैली हुई थी। राव तुलाराम का राज्य आज के कनीना, बावल, फरुखनगर, गुड़गांव, फरीदाबाद, होडल और फिरोजपुर झिरका तक फैला हुआ था।

Rao Tula Ram दादा जी का नाम

राव तुलाराम की माता जी का नाम रानी ज्ञान कुवंर था जो राव ज़हारी सिंह की पुत्री थी। इनके दादा जी का नाम राव तेजसिंह था। राव तुलाराम की दो बड़ी बहनें भी थी। राव तुलाराम को तुलासिंह के नाम से बुलाया जाता था। राव Tularam की शिक्षा तब शुरू हुई जब वो पांच साल के थे। साथ-साथ ही उन्हें शस्त्र चलाने और घुड़सवारी की शिक्षा भी दी जा रही थी। राव तुलाराम अँग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचारों को बचपन से देख रहे थे। उन्हें हिन्दी, फ़ारसी, उर्दू और अँग्रेज़ी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था और वो देश दुनिया के घटनाक्रम पर भी अपनी नज़र लगातार जमाए हुए थे।

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Rao Tula Ram

तुलाराम महज 14 वर्ष के थे तभी इनके पिता का देहांत हो गया था। पिता की मृत्यु के उपरांत राज्य का सारा भार इनकी माता जी पर आ गया था। ओर उस समय भारत पर अंग्रेजी हुकूमत राज कर रही थी। एक 14 साल का बच्चा जिस राज्य में गद्दी पर बैठा हो ये अंग्रेजों के लिये एक सुनहरा मौका था। अंग्रेजी हुकूमत रेवाड़ी रियासत को अपनी हुकूमत से मिलाने के लिये अब नए नए मौके देखने लगी थी।

दोस्तो अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे करके उनकी आधी से अधिक रियासत पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। फिरंगियों के इस कदम के बाद राव Tularam का ख़ून खौलना लाज़मी था। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी एक सेना तैयार की जिसमे रेवाड़ी के लोगों ने भी अपना योगदान दिया। दोस्तो 1857 के विद्रोह की आग जब मेरठ तक पहुंची तो वो भी इस क्रांती में कूद पड़े थे और इसमें उन्हें दिल्ली के बादशाह का भी पूरा सहयोग मिला।

Tularam ने अंग्रेज़ों की नाक में कर दिया था दम :

राव तुलाराम और उनके भाई के नेतृत्व में रेवाड़ी की सेना ने फिरंगियों की नाक में दम कर दिया और रेवाड़ी व उसके आस-पास के कई इलाकों पर वापस से अपना कब्ज़ा कर लिया। एक तरफ मेरठ में सैनिकों का चर्बी वाला कारतूस न इस्तेमाल करने का विवाद चल रहा था और दूसरी तरफ राव तुलाराम का बढ़ता कद। इन दोनों से ही अंग्रेज़ी हुक़ूमत तिलमिलाई हुई थी ओर कुछ बड़ा करने की फिराक में थी।

अंग्रेजों से टक्कर : राव तुलाराम का अंग्रेजी फौज से मुकाबला – Rao Tula Ram Fight with British Army

अब अंग्रेजो ने सोच लिया था कि राव तुला राम को रास्ते से हटाना ही होगा। उनको ख़त्म करने के इरादे से अंग्रेजों ने अपनी सेना को भेजा। ब्रिगेडियर जनरल सोबर्स ने नेतृत्व में एक भारी सेना रेवाड़ी की ओर रवाना कि गई। लेकिन सबकुछ इतना आसान नही था। 5 अक्टूबर 1857 को पटौदी में उनकी झड़प राव तुला राम की एक सैनिक टुकड़ी से हो है।  उस टुकड़ी के वीर बांकुरों ने लगातार एक महीने तक अंग्रेज़ों को घेरे रखा और आगे बढ़ने नहीं दिया।


ब्रिगेडियर जनरल सोबर्स 

अंग्रेजो ने ब्रिगेडियर जनरल सोबर्स  की मदद के लिए कर्नल ज़ैराल्ड भेजा। इसके बाद 16 नंवबंर 1857 में अंग्रेज़ी सेना और राव तुला राम की सेना के बीच नसीबपुर के मैदान में भीषण जंग हुई और अंग्रेजों को खूब कड़ी टक्कर दी गई। इस यद्ध में अंग्रेजी कर्नल जैराल्ड मारा गया। अंग्रेजी सरकार हैरान थी राव तुलाराम ओर उनके रणबांकुरों का साहस देख कर।

अंग्रेज़ों ने यहां आपस मे एक दूसरे को लड़वाने की चाल चली। आसपास की रियायतों को अपनी ओर से राव तुलाराम के ख़िलाफ लड़ने के लिए राज़ी कर लिया।

 
नारनौल के (नसीबपुर) मैदान में हुई भिड़ंत :

16 नवम्बर 1857 को नसीबपुर जो नारनौल में है वहां राव तुलाराम का मुकाबला अँग्रेज़ों से हुआ। फिरंगी हुकूमत को लगा था की वो आसानी से इस विद्रोह को दबा देंगे।  लेकिन राव तुलाराम ने अंग्रेज़ो की फौज पर भयंकर हमला किया। लेकिन इससे पहले की राव तुलाराम इस लड़ाई में जीत कर विद्रोह की आग को दूसरे हिस्सों तक ले जाते – जयपुर, अलवर, नाभा और पटियाला से वफ़ादार राजाओं ने अँग्रेज़ों की मदद के लिए अपनी सेनाएं भेज दी। इन राजाओं की सेना आने से इस लड़ाई में अंग्रेजों का पलड़ा फिर भारी हो गया था।


इस युद्ध मे Rao Tularam के साथी राव किशन सिंह, रामलाल और शहजादा मोहम्मद आज़म मारे गये। क्रांति की आग को जिंदा रखने के लिए राव तुलाराम को जंग का मैदान छोड़कर जाना पड़ा। अब अपने आगे की रणनीति को बनाने के लिए राव तुलाराम, तात्या टोपे से मुलाकात करने गये परन्तु तात्या टोपे को 1862 में ही अंग्रेजी हुकूमत ने बंदी बना लिया गया था

रेवाड़ी

  • जिस वजह से इनकी मुलाकात नहीं हो पाई।
  • दोस्तो इतिहास में तुलाराम के बारे में शोध करेंगे
  • तो आप यकीनन इसी नतीजे पर पहुंचेंगे
  • कि राव तुलाराम सच्चे देश-प्रेमी थे
  • वर्ना दूसरी ब्रिटिश-समर्थक पड़ोसी-रियासतों की तरह वह भी ऐश की पराधीनता स्वीकार कर लेते
  • और रेवाड़ी के शासक बने रहते।
  • लेकिन उनको पराधीनता स्वीकार नही थी।

अब एक बड़ी मुहिम को शुरू करने के लिये तुलाराम मिशन पर निकल पड़ते है और बाहरी देशों से मदद के लिये रूस जाते है। अब वे रूस पहुंचे की नही इसके साक्ष्य तो नही है लेकिन तुलाराम की जीवनी लिखने वाले के सी यादव के अनुसार रूस के जार तक अपने पत्र पहुंचाने में कामयाब हुए, इसके साक्ष्य मौजूद हैं।

काबुल

अपने इस मिशन मे आगे बढ़ते हुये ईरान के रास्ते जब वह काबुल पहुंचे तो उनका गिरता स्वास्थ्य गंभीर स्थितियों में पहुंच गया था और संक्रमण के चलते  23 सितंबर 1863 में काबुल में उनकी मृत्यु हो गई। उस समय उनकी उम्र 38 साल की थी।

इधर राव तुलाराम की संपत्ति 1859 में ही अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी। हालांकि उनकी दोनों पत्नियों के मालिकाना हक को इस सम्पति में बरकरार रखा गया था। बाद में उनके बेटे राव युधिष्ठिर सिंह को बहाल किया गया, जिन्हें अहिरवाल क्षेत्र का प्रमुख बनाया गया था।

आपने इस लॉस्ट में पढ़ा राव तुलाराम का इतिहास। दोस्तो आपको हमारी ये पोस्ट कैसी लगी हमें कमेंट जरूर करना।

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