सुभाष चंद्र बोस की जीवनी। सुभाष चंद्र बोस जयंती | Subhash Chandra Bose

सुभाष चंद्र बोस


सुभाष चंद्र बोस का जीवन परिचय Subhash Chandra Bose biographyसुभाष चंद्र बोस
सुभाष चंद्र बोस का जन्म कहा और कब हुआ ?23 January 1897,
कटक
सुभाष चंद्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस
सुभाष चंद्र बोस की माता का नामप्रभावती बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस कितने भाई बहन थे। भाई- शरत चंद्र बोस, 6 अन्य बहन- 6
सुभाष चंद्र बोस की मौत कब हुई 18 अगस्त, 1945
सुभाष चंद्र बोस ने कौनसी सी पुस्तक लिखी Letters To Emilie Schenkl 1934-1942
सुभाष चंद्र बोस कैसे शहीद हुए थे?
विमान दुर्घटनाग्रस्त
आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन कब हुआ?
1942 में रासबिहारी बोस
आजाद हिंद फौज की महिला शाखा का क्या नाम था?
रानी लक्ष्मी बाई बटालियन
जय हिंद किसका नारा है?
आबिद हसन सफ़रानी
आजाद हिंद फौज ने कौन सा द्वीप आजाद कराया था?
अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप
सत्यार्थ प्रकाश किसकी रचना है?दयानन्द सरस्वती
भगत सिंह का नारा क्या था?
मरकर भी मेरे दिल से वतन की उल्फत नहीं निकलेगी, मेरी मिट्टी से भी वतन की ही खुशबू आएगी
फॉरवर्ड ब्लॉक का संस्थापक कौन था?
सुभाष चन्द्र बोस
सुभाष चंद्र बोस की बेटी का नाम क्या है अनीता बोस
सुभाष चंद्र बोस की पत्नी का नाम क्या है एमिली बोस
फारवर्ड ब्लाक की स्थापना झारखण्ड में कहाँ हुई थी?
माकूर में 1938
सुभाष चन्द्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष कब बने?
1921–1940
सुभाष चंद्र बोस कौन से कास्ट के थे?
कायस्थ
राजनैतिक गुरूदेशबंधु चितरंजन दास
सुभाष चंद्र बोस के नारे तुम मुझे खून दो मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा


Subhash Chandra Bose भारत देश के एक महान क्रन्तिकारी नेता थे। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए आजाद हिन्द फौज का गठन किया था। और उन्होंने तुम मुझे खून दो में तुम्हे आजादी दूंगा का नारा दिया था। और भारत देश में लोग उन्हें प्यार से नेताजी के नाम से पुकारते है। अंग्रेजो से लोहा लेने के लिए वे पहले जापान गए और दूसरे विश्व युद्ध से पहले आजाद हिन्द फौज का गठन किया था।

 

नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नेता के रूप सेना को आगे बढ़ने के लिए प्रेरीत किया और दिल्ली चलो का नारा दिया। और नेताजी की सेना ने जापान की सेना के साथ मिलकर अंग्रेजो से बर्मा इम्फाल कोहिमा में जमकर मोर्चा संभाला था। इकीस अक्टूबर उन्नीस सौ तेतालीस को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सुप्रीम कमांडर होने के नाते सवतंत्र भारत की एक अस्थाई सरकार भी बनाई थी

 

जिसे ग्यारह देशो ने मान्यता दी। और जापान ने अंदमान निकोबार दिवपसमूह नेताजी को दिए थे जहा जाकर सुभाष चंद्र बोस ने उनका नया नाम दिया था। इसके बाद आजाद हिन्द फौज ने सुभाष चंद्र बोस के नेतर्त्व में एक बार फिर उन्नीस सौ चवालीस में बिर्टिश शासन पर हमला किया और भारत के कुछ प्रदेश को मुक्त भी करा लिया।

 

छह जुलाई को सुभाष चंद्र बोस ने रंगून से रेडियो के जरिये महात्मा गाँधी से बात की और युद्ध में विजय के लिए आशीर्वाद माँगा। नेताजी की मौत कैसे हुई इसका आज तक कुछ पता नहीं चल पाया है। तेहिस जनवरी को नेताजी की जयंती मनाई जाती है। इस पोस्ट में हम आपको नेताजी के बारे में पूरी जानकारी देंगे।

सुभाष चंद्र बोस का जीवन परिचय

Subhash Chandra Bose का जन्म तेहिस जनवरी अठारह सौ सत्तानवे को उड़ीसा के शहर कटक में हुआ था। उनका जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था। उनके पिता जी का नाम जानकीनाथ बोस था और उनकी माताजी का नाम प्रभावती था। उनके पिताजी कटक के मशहूर वकीलों में से एक थे।

 

उनके पिताजी शुरुआत में सरकारी वकील थे लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरी को छोड़ कर अपनी खुद की प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। और वो बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रह चुके थे। ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चंद्र बोस के पिताजी को सम्मान में रायबहादुर की उपाधि भी दी थी। सुभाष चंद्र बोस कुल चौदह भाई बहन थे।

 

जिनमे सुभाष चंद्र बोस नोवी संतान और पांचवे नंबर के बेटे थे। सुभाष चंद्र बोस और उनके भाई शरद चंद्र में गहरा लगाव था जो की जानकीनाथ के दूसरे नंबर के बेटे थे। शरद चंद्र की शादी हो चुकी थी और उनकी पत्नी का नाम विभावती था।

 

सुभाष चंद्र बोस की शिक्षा और नौकरी

 

उनका जन्म कटक में हुआ था तो उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी कटक के प्राइमरी स्कूल में ही पूरी हुई थी इसके बाद इन्होने उन्नीस सौ उन्नीस में रेवेनसा कॉलेज में सनातक की पढाई के लिए दाखिला लिया था लेकिन तबियत ख़राब होने के बाद भी

उन्होंने सनातक की पढाई पूरी की और एक बार किसी बात को लेकर छात्रों और अध्यापको के बीच झगड़ा हो गया था तो सुभाष चंद्र बोस ने उनके लीडर के रूप में भूमिका निभाई थी। इसलिए उनको कॉलेज से एक साल के लिए निकल दिया गया । और किसी भी परीक्षा के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया और बंगाल रेजिमेंट में भर्ती देखने भी गए

लेकिन मेडिकल में अनफिट होने की वजह से उनको वहां भी सिलेक्शन नहीं मिला। इसके बाद कुछ जुगाड़ लगाकर उन्होंने स्कॉटिश कॉलेज में फिर से एडमिशन ले लिया। लेकिन उनकी इच्छा अब सेना में जाने की हो रही थी। और फिर से प्रयास करते रहे और फोर्ट विलियम सेना में रंगरूट के रूप में उनको प्रवेश मिल गया था।

 

लेकिन पिता जी की इच्छा के आगे उनको झुकना पड़ा और उनको इंग्लैंड जाना पड़ा और वहां उन्होंने आईसीएस की परीक्षा की तयारी की और चौथे रैंक के साथ पास भी हो गए। लेकिन अभी भी उनके दिमाग में सवामी विवेकानंद और अरविन्द घोष के विचार चक्कर लगा रहे थे। उनको कुछ भी समझ नहीं आ रहा था तो अपने भाई शरतचंद्र को पत्र लिखा और उनसे उनकी राय जाननी चाही। क्योकि वो आईसीएस की नौकरी करके अंग्रेजो की गुलामी नहीं करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आईसीएस की नौकरी छोड़ दी और वापस भारत लौट आये।

 

सुभाष चंद्र बोस की सवतंत्रता संग्राम में भूमिका

वापस भारत आने के बाद Subhash Chandra Bose ने देशबंधु चितरंजन दास से प्रभावित होकर उनके साथ काम करने की इच्छा जताई। जब वे भारत वापस आये तो वे सबसे पहले मुंबई गए और महात्मा गाँधी से मिले। उस समय महात्मा गाँधी मणिभवन में रहते थे। वहां पर बीस जुलाई उन्नीस सौ इकीस को उनकी मुलाकात महात्मा गाँधी से हुई। और गाँधी जी ने उनको वापस कोलकाता जाकर दासबाबू के साथ काम करने की सलाह दी।

इसके बाद सुभाष चंद्र बोस कोलकाता वापस आ गए और चितरंजन दास बाबू से मिले। उस समय गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन चला रखा था। और चितरंजन दास बंगाल में असहयोग आंदोलन की डोर संभाल रहे थे । और इसमें उनके साथ नेताजी भी शामिल हो गए।

इसके बाद उन्नीस सौ बाईस में चितरंजन दास ने कांग्रेस के अंतर्गत सवराज पार्टी की नीव रखी और कोलकाता महापालिका का चुनाव भी लड़ा। और जितने के बाद चितरंजन दास महापौर बन गए। और सुभाष चंद्र बोस को महापालिका का प्रमुख बनाया गया। सुभाष चंद्र बोस और चितरंजन दास ने महापालिका के काम करने के तरीको को बदल डाला और सभी ब्रिटिश नाम हटाकर भारतीय नाम रख दिए ।

इसी वजह से सुभाष चंद्र बोस एक युवा नेता के रूप में उभर कर सामने आये इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने जवाहर लाल नेहरू के साथ मिलकर नोजवानो के लिए इंडिपेंडेंट लीग की नीव रखी। साइमन कमिशन भारत आया तब उसका विरोध हुआ था और काले झंडे दिखाए गए थे । इसमें सुभाष चंद्र बोस आंदोलन के नेता थे।

सुभाष चंद्र बोस की गिरप्तारी

ब्रिटिश सरकार के आयोग साइमन कमिशन को जवाब देने के लिए कांग्रेस ने एक आठ सदस्य टीम को भावी सविधान बनाने का काम सौंपा। और मोतीलाल नेहरू को इस टीम का लीडर बनाया गया था और सुभाष चंद्र बोस इस टीम में एक सदस्य थे । कांग्रेस के बनाये इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की।

 

इसके बाद उन्नीस सौ अठाइस में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेसन हुआ जिसकी अधयक्षता मोती लाल नेहरू ने की थी। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेट्स लेने की पूरी तयारी कर दी थी। लेकिन नेताजी और जवाहर लाल नेहरू को पीछे हटना मजूर नहीं था वो नहीं चाहते थे की पूर्ण सवराजय की मांग को ख़ारिज किया जाये।

डोमिनियन स्टैट्स

इसलिए ये फाइनल किया गया की ब्रिटिश सरकार को एक साल का वक्त दिया जाता है। डोमिनियन स्टैट्स देने के लिए। और अगर एक साल के भीतर ब्रिटिश सरकार उनकी बात नहीं मानती है तो हम पूर्ण सवराजय की मांग करेंगे और अंग्रेज तो अपनी आदत से लाचार थे। उन्हें लगा की भारतीय कुछ नहीं करेंगे इसलिए उन्होंने वो मांग पूरी नहीं की।

इसके बाद कांग्रेस का लाहौर अधिवेसन हुआ और उसमे ये तय हुआ की छबीस जनवरी के दिन सवतंत्रता दिवस पुरे भारत में मनाया जायेगा। और छबीस जनवरी को जब सुभाष चंद्र बोस कोलकाता में राष्ट्र धवज फहराकर विशाल मोर्चे को संभाल रहे थे तब पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया और वो घायल हो गए और उनको जेल में भेज दिया गया।

जब सुभाष जी जेल में थे तब गाँधी जी ने ब्रिटिश सरकार से समझौता किया की उनके राजनितिक बंदियों को रिहा किया जाये। उस समय भगत सिंह , राजगुरु , और सुखदेव भी उसी जेल में बंद थे और उनको फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। और गाँधी जी द्वारा भगत सिंह और उनके साथियो को नहीं बचा पाने पर सुभाष चंद्र बोस नाराज हो गए

कारावास

सुभाष चंद्र बोस को पुरे जीवन काल में कुल ग्यारह बार जेल भेजा गया था। सबसे पहले वो सोलह जुलाई उन्नीस सौ इकीस में छह महीने के लिए जेल गए थे। सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश सरकार ने शक की बिनाह पर जेल भेज दिया था। उन्नीस सौ पचीस में गोपीनाथ साहा ने कोलकाता पुलिस अफसर चाल्र्स टेगार्ट को मारने की प्लानिंग बनाई थी। लेकिन गलती से एक व्यापारी की मौत हो गई और गोपीनाथ साहा को गिरप्तार करके फांसी की सजा दे दी गई।

और इसकी खबर सुनकर सुभाष चंद्र बोस बहुत रोये और अंतिम संस्कार के लिए उनका शव माँगा था। और ब्रिटिश सरकार को संदेह हुआ की सुभाष चंद्र बोस भी उसके साथ मिला हुआ था और उसको पकड़ कर मांडले जेल में डाल दिया गया। और उन पर कोई मुकदमा नहीं चलाया गया था। इसके बाद पांच नवंबर उन्नीस सौ पचीस में चितरंजन दास की मौत हो गई थी।

मांडले जेल

वही दूसरी और मांडले जेल में रहने पर सुभाष चंद्र बोस को टीबी की बीमारी हो गई थी। फिर भी ब्रिटिश सरकार ने उनको छोड़ने से मना कर दिया। लेकिन ब्रिटिश सरकार एक शर्त पर उनको छोड़ने के लिए राजी हो गई की वो इलाज के लिए यूरोप चले जाये लेकिन बोस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और बात वही ख़त्म हो गई

लेकिन जेल में सुभाष चंद्र बोस की तबियत बहुत जयादा ख़राब हो गई। जिससे ब्रिटिश सरकार घबरा गई थी और वो कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे इसलिए उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को छोड़ दिया इसके बाद वे डलहौजी चले गए और अपना इलाज करवाया। लेकिन उन्नीस सौ बतीश में उनको फिर पकड़ कर जेल में डाल दिया गया और उनकी तबियत फिर से बहुत ख़राब हो गई और डॉक्टर के कहने पर वो यूरोप चले गए

सुभाष चंद्र बोस का यूरोप निवास

अपनी बीमारी को लेकर परेशान सुभाष चंद्र बोस मज़बूरी में यूरोप चले गए। उन्नीस सौ तैतीस से लेकर उन्नीस सौ छतीस तक नेताजी यूरोप में रहे। और यहाँ पर भी उन्होंने अपने सवास्थय का ध्यान रखते हुए अपना कार्य जारी रखा। वहां पर नेताजी इटली के नेता मुसोलिनी से मिले और मुसोलिनी ने ब्रिटिश के खिलाफ भारत का साथ देने का वादा सुभाष चंद्र बोस को दिया।

वही पर आयरलैंड के नेता डी वालेरा भी सुभाष चंद्र बोस के करीबी मित्र बन गए थे। सुभाष के यूरोप प्रवास के दौरान जवाहर लाल नेहरू की पत्नी का निधन आस्ट्रिआ में हो गया था तो सुभाष चंद्र बोस आस्ट्रिआ गए और उनको सांत्वना दी। वहां पर सुभाष चंद्र बोस विठ्ठल भाई पटेल से मिले और उनके साथ काफी समय बिताया।

विठ्ठल भाई ने अपनी वसीयत में सारी धन दौलत सुभाष के नाम कर दी थी और उनकी मौत हो चुकी थी। लेकिन सरदार बलभ भाई पटेल को वो वसीयत मंजूर नहीं थी इसलिए उन्होंने मुकदमा चलकर सारी सम्पति वापस ले ली। जो बाद में सरदार बल्लभ भाई पटेल ने हरिजन सेवा में दान कर दी।

इसी दौरान सुभाष चंद्र बोस को पता चला की उनके पिता की तबियत बहुत ख़राब है तो वो कोलकाता वापस आये लेकिन कोलकाता आते ही उन्हें फिर से ब्रिटिश सरकार ने पकड़ लिया और कई दिन जेल में रखने के बाद वापस यूरोप भेज दिया।

सुभाष चंद्र बोस का आस्ट्रिआ में प्रेम विवाह

नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने इलाज के लिए आस्ट्रिआ में रुके थे । तो वो अपनी पुस्तक भी लिख रहे थे तो उनको एक इंग्लिश जानने वाले टाइपिस्ट की जरुरत थी तो उनके एक मित्र ने एक महिला से मिलाया जिसका नाम एमिली था और वो महिला ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली थी। और उस महिला के पिता एक पशु डॉक्टर थे। और कुछ समय बाद सुभाष और एमिली के बीच प्यार की शुरुवात हो गई और उन्होंने शादी कर ली और एक बेटी को भी जन्म दिया। जिसका नाम अनीता था। जो आज भी जीवित है। और कभी कभी भारत आती रहती है।

हरीपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद

उन्नीस सौ अड़तीस में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेसन हरिपुरा में होने वाला था और इस अधिवेशन के लिए महात्मा गाँधी ने सुभाष चंद्र बोस को सेलेक्ट किया था। इस अधिवेसन में नेताजी ने बहुत ही प्रभावशाली स्पीच दी थी। और शायद ही कभी किसी नेता ने ऐसा भाषण दिया हो। अपने कार्यकाल के दौरान नेताजी ने योजना आयोग की नीव रखी थी। और पंडित जवाहर लाल नेहरू को इसका मुखिया बनाया गया था। और इसके आलावा एक विज्ञानं परिषद् की नीव भी रखी गई थी।

कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा

गाँधी जी ने ही सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्ष बनाया था लेकिन वो उनकी कार्यशैली से खुश नहीं थे। और उसी समय दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चूका था। और नेताजी चाहते थे की इसी का फायदा उठाकर भारत में सवंत्रता के आंदोलन को तेज किया जाना चाहिए लेकिन गाँधी जी ऐसा नहीं चाहते थे।

लेकिन सुभाष चंद्र बोस को भी झुकना मंजूर नहीं था इसलिए गाँधी जी उनको पद से हटाना चाहते थे। इसके बाद चुनाव भी हुआ और इसमें भी सुभाष चंद्र बोस को ही जित मिली और गाँधी जी इससे बहुत नाराज हो गए और अधिवेशन भी नहीं आये

लेकिन कुछ समय बाद सुभाष चंद्र बोस की तबियत ख़राब होने की वजह से उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना

इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अंदर ही एक नयी पार्टी की नीव रखी

जिसका नाम था फॉरवर्ड ब्लॉक। इसके कुछ समय बाद कांग्रेस ने सुभाष चंद्र बोस को निकाल दिया

और उनकी फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी एक सवतंत्र पार्टी बन चुकी थी।

नजरबन्दी से पलायन

सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश सरकार ने नजरबन्द कर दिया था

तो नेताजी ने निकलने के लिए एक प्लान त्यार किया

और एक पठान की वेशभूषा में घर से निकल गए

कोलकाता से होते हुए गोमोह तक पहुंच गए। वहां से सीधे मेल पकड़कर पेशावर गए

और पार्टी के लोगो से मिले। इसके बाद वे अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की और रवाना हो गए।

वहां से होते हुए वो रूस और इसके बाद जर्मनी पहुंचे।

जर्मनी में सुभाष चंद्र बोस हिटलर से मिले लेकिन हिटलर से कोई सहायता नहीं मिली

वो जर्मनी से निकल कर पूर्व एशिया की और चले गए।

और वहां से इंडोनेशिया के पादांग बंदरगाह तक पहुँच गए थे।

पूर्व ऐसा में सुभाष चंद्र बोस रास बिहारी बोस से मिले

और रास बिहारी बोस ने सवेचा से सवतंत्र परिषद् का भार नेताजी को सौंप दिया।

जापान के प्रधानमंती ने नेताजी को सहायता का आश्वासन दिया।

और यही पर सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया।

और आजाद हिन्द फौज में महिला बटालियन को रानी झांसी का नाम दिया गया।

दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार से आजाद हिन्द फौज का मनोबल टूट गया और सेना हारने लगी थी।

और सुभाष चंद्र बोस इसके बाद रूस से सहायता प्राप्त करने के लिए रूस रवाना हो चुके थे

लेकिन रस्ते में विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई और इसके बाद उनको कभी नहीं देखा गया

लेकिन आज तक ये सच्चाई सामने नहीं आ पाई है की उनकी मौत कैसे हुई।

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